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“दही चूड़ा” और बिहार

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मैं 2008 में बारहवीं की परीक्षा के बाद दिल्ली चली गयी थी | आठ वर्ष तक पत्रकारिता की पढाई व नौकरी में इसी शहर में जूझती रही | कई दफ़े त्योहारों पे घर जा पाती तो कई बार पी.जी. या हॉस्टल में दोस्तों के साथ ही होली-दिवाली मनानी पड़ती थी | हमलोग यूँ तो छपरा के रहने वाले हैं लेकिन मेरा बचपन बिहार के ही बेगूसराय ज़िले में बीता है | हर साल 14 जनवरी को हम “दही चूड़ा” या “मकर संक्रांति” का त्योहार मनाते आये हैं | आज के दिन इस बार मैं सौभ्यावश अपने दादा दादी के पास छपरा में हूँ और कई सालों बाद मुझे इस त्योहार को पूरी तरह से जीने का मौका मिल रहा है |

आज के दिन देश के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न रिवाज़ों के साथ इस त्योहार को मनाया जाता है | आधुनिकता और वेस्टर्नाइज़ेशन के इस दौर में सब कुछ काफी स्टैंडर्डाइज़्ड हो चूका है | जिस राज्य का जो त्योहार बॉलीवुड या पॉप कल्चर में कूल दिखता है, उसे हम सब अपना लेते हैं और अपने राज्यों की ख़ास संस्कृति को पीछे छोड़ते चले जाते हैं | देखते ही देखते कब होली रेन डांस में तब्दील हो गया और दुर्गा पूजा डी जे डांस सेशंस में, पता ही नहीं चला | एक वक़्त था जब इन त्योहारों के अवसर पर देश के भिन्न हिस्सों में लोक नृत्य व गायन का माहौल रहता था लेकिन अब (ख़ास तौर पर शहरों में) बॉलीवुड के आइटम नंबर ही गूंजते हैं |

ख़ैर, मुझे पता हैं कि बहुत सारे लोगों को मेरी बातें तक़ियानूसी लगेंगी | तो, मैं क्या नहीं है- के बजाय – क्या है- उसपर प्रकाश डालती हूँ | नहाकर हम पहले सूप में रखे पांच अन्नों को छूकर उनका नमन करते हैं और फिर साथ बैठकर व्यंजन खाते हैं । आज मैं अपने दादा दादी के पास बिहार में हूँ और काफ़ी दिनों बाद घर में मिट्टी के घड़े में जमाई दही खायी है| घर में दादी के साथ मिलकर औरतों ने ढेर सारे तिल के लड्डू तथा मूढ़ी और गुड़ की लाई बनायीं है| बासमती चूड़े के साथ मलाईदार दही और तिलकुट खा के स्वर्ग की प्राप्ति हो गयी | हमारे यहाँ “दही चूड़ा” के दिन साथ में लज़ीज़ सब्ज़ी भी बनती है| खेत के ताज़े आलू और कटहल की सब्ज़ी और गोभी के भुजिया में जो मज़ा था उसकी बात ही क्या करूँ ! रात को हम परंपरागत रूप से आज के दिन खिचड़ी चोखा खाते हैं | इसलिए आज के त्योहार को बिहार के कुछ हिस्सों में “खिचड़ी” भी बुलाया जाता है |

कभी फुरसत में हों तो बिहार आइये और इस त्योहार को पूरी रवानी में खिलता देखिये | लकड़ी की आग सेकते हुए ठंडा दही चूड़ा खाने में एक अलग संतोष है | मैं खुश हूँ की इस वर्ष के त्योहारों का आग़ाज़ घर पर कर सकी | आज कल की भागती ज़िन्दगी में मिले ये पल ही सबसे बड़ी पूँजी हैं |

About Post Author

Surabhi Pandey

A journalist by training, Surabhi is a writer and content consultant currently based in Singapore. She has over ten years of experience in journalistic and business writing, qualitative research, proofreading, copyediting and SEO. Working in different capacities as a freelancer, she produces both print and digital content and leads campaigns for a wide range of brands and organisations – covering topics ranging from technology to education and travel to lifestyle with a keen focus on the APAC region.
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