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दिल्ली, बिहार और रेल की सवारी

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ट्रेन से सफ़र करना आम बात रही है… आठ साल के दिल्ली के दौर में घर आना जाना ट्रैन से ही होता था..

आज बड़े दिनों बाद आनंद विहार टर्मिनल से ट्रेन की सवारी कर के बेगूसराय जा रही हूँ.. इमोशनली तो काफ़ी अच्छा लग रहा लेकिन वैसे हालत ख़राब है | पसीने से लथपथ, प्लेटफार्म पर माँ के साथ बैठी, अरुणाचल स्पेशल का इंतज़ार कर रही हूँ | दिल्ली का यह स्टेशन ख़ास तौर से बिहार की ट्रेनों के लिए बनाया गया है | क्यूंकि हमारे यहाँ से बहुत लोग आवा-जाहि करते हैं | दिल्ली में मैंने ऐसे बैंक्स भी देखे हैं जिनके मैनेजर से लेकर सिक्योरिटी गार्ड तक बिहारी हैं | काफ़ी कब्ज़ा है हमारे लोगों का राजधानी में | फिर भी “बिहारी” एक गाली है दिल्ली में | क्यों ?

बुरा लगता है.. कचोटती है ये बात दिल को लेकिन गौर से सोचा जाए तो हर स्टीरियोटाइप के पीछे जेनरली कॉमन फैक्ट्स होते हैं |

प्लेफॉर्म पर नज़र दौड़ाया मैंने तो एक लाइन से जनरल बोगियों में कूदने वालों की भीड़ दिखी | उस भीड़ में अधिकतर, लगभग सौ प्रतिशत, जवान मर्द और उन सब की हालत बयान कर रही उनकी बेरोज़गारी और ग़रीबी की दास्ताँ | एक ओर नज़र दौड़ाया तो तीन महिलाएं दिखीं – एक प्रेग्नेंट साथ में एक बेटे के साथ और दो, तीन अलग-अलग साइज़ के बेटों के साथ | इस दृश्य से मालूम पड़ता है की मानो मर्द पैदा हुए जा रहे और बेरोज़गारी में स्ट्रगल किये जा रहे; वहीँ औरतें दे दनादन बच्चे पैदा किये जा रहीं | ये बिहार के हर घर का सच नहीं है लेकिन ये बिहार के अधिकतर घरों का सच ज़रूर है |

जब ज़िन्दगी इतनी कठिन हो तो सफ़ाई, हाइजीन और मोरालिटी जैसी चीज़ें किसके दिमाग में आएंगी ? बिहार तो किताबी साक्षरता में भी इतना पीछे है तो सामाजिक साक्षरता कब और कैसे आये?

ख़ैर, हालत इतनी भी नेगेटिव नहीं है | देश के सबसे ज़्यादा अफसर और डॉक्टर आज भी हम पैदा करते हैं | हमने ही विश्व को गौतम बुद्ध, आर्यभट्ट और दिनकर का भेंट दिया है | लेकिन सवाल ये है कि या तो हम बेरोज़गार पैदा कर रहे हैं या तो आला अफ़्सर … ये गैप एक चेतावनी है | ये कोई नयी बात नहीं है और इसलिए ज़्यादा फ़िक्र करने की ज़रुरत है | ऐसे में ग़लत कौन है ? सिर्फ़ सरकार को बैठकर गाली देना काफ़ी और जायज़ है क्या? मुझे लगता है कि जब तक हम ख़ुद नहीं जागेंगे सरकार भी सोती ही रहेगी | बिहार में बहुत पोटेंशियल है, हम भी बहुत कुछ कर सकते हैं, बस ज़रुरत है क्षमताओं को समझने की और उन क्षमताओं के दायरे में भी अगर हम अपना सौ प्रतिशत दें तो शायद चीज़ें बदल सकती हैं, शायद सरकार भी कुछ कर सके |अगर हम बेसिक एजुकेशन और फॅमिली प्लैनिंग जैसी सिंपल लेकिन ठोस बातों पे ध्यान दें तो शायद बिहार का रूप बदल सकता है..

एवरीथिंग सेड एंड डन.. “बिहारी” शब्द का इस्तेमाल एक गाली की तरह करने वाले सबसे बड़े गवाँर हैं | अगली बार ऐसा कोई बोलते हुए सुनाई दे तो मेरी तरफ़ से एक तेज़ चमाट लगाइएगा.. शायद दिमाग की बत्ती जल जाये |

About Post Author

Surabhi Pandey

A journalist by training, Surabhi is a writer and content consultant currently based in Singapore. She has over ten years of experience in journalistic and business writing, qualitative research, proofreading, copyediting and SEO. Working in different capacities as a freelancer, she produces both print and digital content and leads campaigns for a wide range of brands and organisations – covering topics ranging from technology to education and travel to lifestyle with a keen focus on the APAC region.
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