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तो हमने बदल डाली अपनी मंज़िल

तो हुआ यूँ की सफ़र इतना लम्बा लगने लगा कि हमने अपनी मंज़िल ही बदल डाली | निकले थे बरौनी के लिए; बीच में सौभाग्यवश छपरा पड़ रहा है जो की मेरे दादा दादी का घर है | तो तय किया कि […]

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ट्रेन लेट है

हाँ तो ट्रेन लेट है… यही कुछ आठ-दस घंटे से.. लेकिन ये तो आम बात है भारतीय रेल के लिए.. वो भी दिल्ली बिहार रूट में तो अगर टाइम पे पहुंच जाएं तो घबराने वाली बात होती है | डिप वाली गन्दी […]

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दिल्ली, बिहार और रेल की सवारी

ट्रेन से सफ़र करना आम बात रही है… आठ साल के दिल्ली के दौर में घर आना जाना ट्रैन से ही होता था.. आज बड़े दिनों बाद आनंद विहार टर्मिनल से ट्रेन की सवारी कर के बेगूसराय जा रही हूँ.. इमोशनली तो […]

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कोई क्यों चला जाता है

जब तक हैं और जो-जो हैं
प्यार, इज़्ज़त और वक़्त बाटें
पता नहीं
कब कौन साथ छोड़कर चला जाये
पता नहीं
कब हम ही इस दुनिया से चले जाएँ…

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ओपिनियन: महिला दिवस मनाने का ढोंग अब मीडिया को बंद कर देना चाहिए

एक टूटा सितारा और रेटिंग्स की छीछा लेदर अभी चार रोज़ बाद वो दिन आएगा, जो दिन ‘वुमेंस डे’ कहलाएगा चीख-चीख कर हर एंकर, ये त्यौहार मनाएगा नारी के सम्मान का, हर पत्रकार गुणगान गाएगा जो चली गयी उसको तो बख्शा नहीं, […]

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अस्तित्व

कि बटुए से झांकती वो शिल्पा की लाल बिंदी की पत्ती, एक अलग कहानी सुनाती है… तुम्हारे बदन पे जचती जीन्स और जैकेट से परे, किसी और पहचान की दास्तान बताती है…   कि तुम्हारी छोटी सी ब्लैक ड्रेस के स्लीव से […]

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सरस्वती पूजा, मेरा बचपन और भारत

सरस्वती पूजा के साथ बचपन की ढेर सारी यादें जुड़ी हैं । अब कहाँ नसीब होता है वो सब । जैसा की आप सब जानते ही हैं, मेरा बचपन बिहार के बेगूसराय ज़िले में बीता है । हमारे यहाँ हर त्योहार काफ़ी […]

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“दही चूड़ा” और बिहार

मैं 2008 में बारहवीं की परीक्षा के बाद दिल्ली चली गयी थी | आठ वर्ष तक पत्रकारिता की पढाई व नौकरी में इसी शहर में जूझती रही | कई दफ़े त्योहारों पे घर जा पाती तो कई बार पी.जी. या हॉस्टल में दोस्तों […]

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कि अँधेरा घना है

  कि अँधेरा घना है कोई नयी बात नहीं है ये कुछ अचानक नहीं हुआ मालूम था शुरुआत से क़ि जब तक काम की हूँ तभी तक नाम की हूँ कि अँधेरा घना है था हमेशा से, लेकिन छुपा हुआ था अब […]

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