बदलना हम सबको पड़ेगा -समय के साथ बदलाव ज़रूरी है : अभिषेक पाण्डेय

वैसे तो बचपन में हर माँ-बाप अपने बेटे बेटियों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं ,लेकिन पता नहीं क्यों ये सब सीख बच्चों के परीपक्व होते होते कहाँ चली जाती है | क्या इस बारे में सोचने की जरुरत नहीं है ? और क्या ये सीख बस बच्चों तक ही सीमित थी ? क्या इससे बड़ों का कोई लेना देना नहीं है ?

और ये मैं इसलिए कह रहा हूँ के ये वही माँ-बाप हैं जो बचपन में तो बच्चों को हरिश्चन्द्र की कहानियाँ सुना कर बड़ा करते हैं | और ना जाने कितनी ही बार उनको ये सीख देते हैं के “बेटा पांव उतने ही फैलाने चाहिए जितनी चादर हो ” और भी इसी तरह के जुमले | जो एक बच्चा परीपक्व होते होते ना जाने कितनी ही बार अपने परिवारीजनों से सुन चूका होता है |

लेकिन सच पूछिये तो क्या आगे चल के इन सब बातों का कोई वजूद रह जाता है ?? मेरी राय में तो ये सब बातें बस उन बातों की तरह मात्र ही हैं ,जैसे किसी धारावाहिक या फ़िल्म की शुरूआत में एक सन्देश आता है जिसको हम लोग बस सुनते मात्र हैं ” इस    धारावाहिक/फ़िल्म के सभी पात्र अवोम घटनाएं काल्पनिक हैं……..”

यहाँ मैं ये ही पूछना चाहता हूँ के कब हम इस  काल्पनिकता से बाहर निकलेंगे ??

अब हम उस अहम् मुद्दे पर आते हैं जहाँ पहुँच के ये सारी बचपन की सीख एक बेईमानी साबित होती है,क्योंकी इनका अस्तित्व ही धूमिल हो जाता है ||

मुद्दा है “दहेज़-प्रथा” | और मुझे ये सोच के बहुत आश्चर्य होता है के किस तरह बचपन से सीख देने वाले ही इसके भागिदार बनते हैं |  और समाज में अन्य उत्पादों की तरह ही लड़कों की रेट-लिस्ट तय होती है, सामान्य स्नातक 5 से 10 लाख , सरकारी-पेशा 10 से 15 लाख और डॉक्टर अवोम इंजीनियर का 15 से 30 लाख अमूमन आम बात है | बात यहां भी रुक जाये तो भी भला है लेकिन जिनके जिम्मे इसको रोकना होता है ऐसे प्रशासनिक पदों पे बैठे हुए व्यक्क्ति का रेट तो ऐसा है जैसे आप IPL में किसी खिलाड़ी की बोली लगा रहे हो फलानी पोस्ट 1 करोड़ फलाना डिपार्टमेंट 2 करोड़ |

आज जहाँ हम एक ओर हर जगह बेटा बेटी समानता का झंडा बुलंद कारने में लगे हैं वहीँ दूसरी ओर वो समाज है, जहाँ ये सोचना भी पाप है | बाप बेटी को ना पढ़ाये तो गलत ,पढ़ाये तो उसके योग्य वर् के लिए दहेज़ की टेंशन | ऐसे में एक बेटी का बाप करे भी तो क्या करे ?? और उसपर से ये समाज के बेटा-बेटी अगर अपनी पसंद से बिना इन सामाजिक रिवाजों के विवाह करें तो वो भी गलत |

एक पिता जो लगभग अपनी हैसियत से ज्यादा सब कुछ करता है अपने बच्चों के लिए उस पर सामाजिक       रीति-रिवाजों के नाम पर दहेज़ रूपी बेढंगा बोझ लादने का क्या तात्पर्य है | अगर आपने अपने बेटे को पढ़ाया है तो उसने भी अपनी बेटी को पढ़ाया है, तो बेटे की काबिलियत के नाम पे उसका मूल्य-निर्धारण करना कहाँ तक जायज़ है ?? और अगर ये ही करना है तो फिर वस्तु-विनिमय का तरीका शायद भूल रहे हैं हम लोग | क्योंकि अगर हम किसी वस्तु का मूल्य निर्धारण करते हैं तो उसे वो इंसान अपने साथ ले जाता है जो उसकी निर्धारित कीमत देता है | फिर तो ये बेटी के पिता के साथ धोखा है क्योंकि आपको वो निर्धारित कीमत भी दे रहा है आपके बेटे की और उसे आपका बेटा भी नहीं मिल रहा, वरन् आप उसकी बेटी को भी अपने साथ लिए जा रहे हैं ,ये तो सरासर गलत है | इस ओर किसी को तो सोचने की जरुरत है |

तो मेरा कहना बस इतना ही है के अगर बचपन की। सिखाई बातें धोखा है ,तो इन सब का क्या फायदा ??मत सिखाइये कुछ भी,सिखने दीजिये उसे खुद से शायद इसी बहाने उसे अपने और समाज के अच्छे और बुरे की समझ आ जाये | क्योंकि अगर वो खुद सीखेगा तो शायद उसके और समाज के लिए क्या सही है और क्या ग़लत ज्यादा गहरायी से जान पायेगा|

और अपने अंदर झाँकने की जरुरत हम सब को है ,क्योंकि एक बेटी के पिता के रूप में रूप में हमे दहेज़ जितना बेढंगा प्रतीत होता है एक बेटे के पिता बनते ही उतना आकर्षक लगने लगता है।

अंत में बस इतना ही कहूँगा…

“बदलना हम सबको पड़ेगा -समय के साथ बदलाव ज़रूरी है “

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