“समाज”… एक खोखली व्यवस्था – अभिषेक पांडेय

यूँ तो समाज अनेकों सूत्रों के जुड़ने से बनता है और समाज का काम लोगों में एकजुटता लाना उनमे अपनेपन का विस्तार करना है, उनको इतना सबल बनाना है के वो खुद का और और इस समाज का भला सोच सके, सही और गलत में अंतर कर सकें , लेकिन हमारा भारतीय समाज एक अलग ही “मान’sick’ता” लिए हुए है, जहां पे लोगों में पड़े अंतर को कम करना नहीं वरन् उसे और बढ़ाना कैसे है ये सिखाया जाता है ।

समाज किसी एक से नहीं बनता वो बनता है समाज के हर उस एक इंसान से जो उसका हिस्सा है , भले ही वो समाज में अपना योगदान दे न दे , लेकिन समाज का उत्तरदायित्व उस इंसान के लिए ख़त्म नहीं होता ।

लेकिन हमारे भारतीय समाज के बारे में ये कहना कतई न्यायोचित नहीं है,क्योंकि समाज जिन लोगों से मिल कर बना है जिन परिवारों की रूपरेखा से इसने अपना ढांचा तैयार किया है उनमे ही अनेकों दोष है  ।

बचपन में जो परिवार हमे ये सिखाता है कैसे हमे सपनो के पीछे भागना है , कैसे उनको पाना है , समय के साथ ही वो ही हमारी कुछ बातों को बस ये कह कर टालने लग जाते हैं के “सपने देखना बंद करो “

अरे कोई उनको याद दिलाओ के आप ही ने मुझे सपने देखने और उनको पाने के लिए प्रोत्साहित किया था अब अचानक आप ही क्यों रोक रहे हैं ??

बात बस इतनी सी है की जिस समाज में हम रह रहे हैं वो खुद ही अपने अभिमान और हमारी खुशियों के बीच में आज तक सामंजस्य बैठाना नहीं सीख पाया है।ये ही कारण है के जिस समाज की जिम्मेदारी लोगों के बीच में अंतर कम करना है वो ही अपने हठ के कारण दो लोगों को बस इस वजह से जिंदगी साथ जीने की मनाही कर देता है क्योंकि वर्ण-व्यवस्था उसको ऐसा करने से रोकती है, क्योंकी लड़का और लड़की जाति से अलग हैं।

इतना तो भगवान् ने बनाते समय अंतर नहीं किया जितना इस समाज में आने के बाद समाज के ठेकेदारों ने बता दिए

बच्चों को हर बात का सही गलत सिखने की खुद में आज़ादी है, लेकिन अपने से अपना जीवन साथी चुनने की आज़ादी कब मिलेगी ?

कब तक जाति-भेदभाव के नाम पर दो लोगों को अलग किया जाता रहेगा जो भले ही एक जाति के न सही पर शायद एक दूसरे को उनसे अच्छा कोई और नहीं जान सकता ।

जब हर बात की आज़ादी है तो एक आज़ादी और दे दो ।

One comment

  1. दूसरी जाति छोड़ो अगर प्रेम विवाह करना हो तो अपनी जाति वाले लोग ही नहीं मानते हैं क्योंकि प्रेम विवाह समाज, जाति की नजर में अपराध है।। जब अपनी जाति मतलब उपजाति में हम अपना जीवनसाथी अपनी मर्जी से नहीं चुन सकते तो फिर दूसरी जाति में कैसे ये हो सकता है?

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