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माँ कहती है

जब हम छोटे थे मम्मी एक बात हमेशा कहती थी कि कोई भी तालीम कभी ज़ाया नहीं जाती | वो कहती थी कि जहाँ जो ज्ञान मिल रहा है – किताबी या बहार से – उसको सीरियसली लो; कब कौन सा ज्ञान कहाँ काम आएगा किसे पता |

मैं बचपन से ख़ुराफ़ाती हूँ | सिर्फ़ एक काम से मेरा मन कभी नहीं भरता | स्कूल के दिनों में भी मैं म्यूज़िक, डांस, स्काउट्स एंड गाइड्स, खेल कूद (खो-खो), ओल्य्म्पियाड और न जाने किन किन चीज़ों में शामिल हुआ करती थी | पढ़ाईतो चलती ही थी लेकिन उसके साथ हज़ार चीज़ें और भी | हर ज़ीरो पीरियड के लिए मुझे रुकना होता था – आज ये प्रैक्टिस है तो कल वो |

करीकुलर एक्टिविटीज़ के प्रति मेरे चाव को माँ ने कभी रेस्ट्रिक्ट नहीं किया | इन फैक्ट, हमेशा बढ़ावा दिया | डांस और म्यूज़िक में मेरे इंटरेस्ट को देखते हुए मम्मी ने मेरा दाख़िला कत्थक स्कूल में करा दिया | मैंने बेगुसराय ही नहीं बल्कि बिहार के जाने माने कत्थक गुरु श्री सुदामा सर से जयपुर घराने में कत्थक की तालीम ली | वहां मेरी मुलाक़ात उनकी बेटियां – वाणी दी और बेनु दी से हुई | उनके साथ भी मैंने बहुत सारी क्लास्सेस ली और बहुत कुछ सीखा | वाणी दी तो मेरी सहेली और बड़ी बहन जैसी हो गयीं | उनसे डांस सीखना और उनके साथ घंटों बातें करना – मेरी ज़िन्दगी के कई रविवार ऐसे ही बीते | प्रयाग संगीत समिति द्वारा मान्यता प्राप्त सेंटरों पर जाकर वार्षिक परीक्षा देना भी एक वार्षिक इवेंट समान होता था | सारे साथ ताल और टुकड़े प्रैक्टिस करते हुए जाते थे |कत्थक एक साधना है – पूजा है – यही सिखाया था दी ने |

डांस के साथ साथ मेरा दाख़िला म्यूज़िक में भी हुआ था | हारमोनियम पर वोकल की तालीम मुझे वंदना मिस से मिली | साथ में अंजनी सर तबले पर सुर लगाना भी सिखाते थे | संगीत सीखने में बहुत सब्र और तपस्या चाहिए | संगीत की परीक्षा भी प्रयाग संगीत अल्लाहाबाद के अंदर ही देनी होती थी | मज़ा आता था |

धीरे धीरे पढाई का प्रेशर बढ़ा और कुछ पांच – छह सालों में घुँघरू और हारमोनियम छूट गए | स्कूल ख़त्म हुआ, फिर कॉलेज और इंटेर्नशिप्स की रेस शुरू हो गयी | एक दफ़े बैठी सोच रही थी तो माँ को ताना दिया कि तुम्हारी वो बात ग़लत साबित हो गयी | न संगीत और कत्थक काम आये और न कभी दुबारा मौका मिला – तो ये तालीम तो बर्बाद हो गयी | माँ ने हसते हुए कहा कि ज़िन्दगी बहुत लम्बी है, इतनी जल्दी फ़ैसला मत करो |

इस वाक्ये के दो-तीन साल बाद मुझे दूरदर्शन में एंकर एवं स्क्रिप्ट-राइटर बनने का मौक़ा मिला | मेरा बीट था आर्ट एंड कल्चर | ऑडिशन में मैंने जो स्क्रिप्ट लिखी उसमे ताल से लेकर घराना तक और कवितांगी से लेकर टुकड़े तक सब एक्सप्लेन कर दिया क्यूंकि मेरे पास पांच साल का वो ज्ञान था | मुझे फर्स्ट ऑडिशन में ही नौकरी मिल गयी और उसके बाद मैंने देश के पद्मविभीषणो से लेकर लोक आर्टिस्ट्स तक के इंटरव्यू लिए |

मैंने तो माँ की बात का लोहा मान लिया | ये सच है, कोई भी ज्ञान व्यर्थ नहीं जाता|

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Comments

Mamta Pandey
June 15, 2018 at 12:03 am

Correct.
Achchi tarah padhayi ki aur itna kuch sikha to achcha sochti air achcha likh pati ho.
Always remain positive and keep on writing.
Love u.



Mamta Pandey
June 15, 2018 at 12:03 am

Correct.
Achchi tarah padhayi ki aur itna kuch sikha to achcha sochti aur achcha likh pati ho.
Always remain positive and keep on writing.
Love u.



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