हिंदी रचनायें

खिलौने और बचपन

अक्सर घरों में बच्चों के लिए ढेर सारे सॉफ्ट टॉयज़ लाये जाते हैं | ये एक आम बात है | हमारे घर में भी काफी सारे सॉफ्ट टॉयज़ हैं लेकिन हमारे सन्दर्भ में इस बात के पीछे एक खासियत है और वो यह कि ये टॉयज़ किसी बच्चे के लिए नहीं बल्कि मेरी माँ के लिए हैं !

मेरी माँ को खिलौने बहुत पसंद हैं, ख़ास तौर से सॉफ्ट टॉयज़ | हमारे घर के हर कोने में आपको एक प्यारा सा टेडी बेयर या मिनियन दिख जाएगा | इन सारे टॉयज़ के नाम हैं और ये गंदे न हों इसलिए इन्हे सेलोफीन में रैप कर के रखा जाता है |

मम्मी बतातीं हैं कि जब वो बच्ची थीं, उन्होंने किसी किताब में एक कहानी पढ़ी थी | उस कहानी में एक लड़की होती है जिसके पास ढेर सारे सॉफ्ट टॉयज़ होते हैं लेकिन वो उन्हें ठीक से नहीं रखती | किसी का हाथ तोड़ देती है तो किसी के कपड़े मैले कर देती है – तो रोज़ रात को वो सारे खिलौने उठकर आपस में बात करते हैं | वे रोते हैं और उस लड़की को बुरा भला कहते हैं | इस कहानी का मेरी माँ पर बचपन में ऐसा असर हुआ कि वो आज तक जितने खिलौने हो सके घर में रखती हैं और उन्हें बड़े प्यार से सजाती हैं |

जब मैं कॉलेज से छुट्टियों में घर आती थी तो हर बार माँ के लिए एक प्यारा सा सॉफ्ट टॉय लाती थी | कभी छोटा कभी बड़ा – जितने पैसे होते थे उस हिसाब से | काफी टॉयज़ मेरी दादी भी लातीं थीं, इम्फाल और बर्मा के मार्केट्स से | हर खिलौने के पीछे एक कहानी है, एक दौर की झलक है | अच्छा लगता है कि माँ ने आज तक सब संभाल कर रखा है | आज इन खिलौनों को देखकर न जाने कितनी यादें ताज़ा हो जाती हैं |आखिर इन्ही छोटी-छोटी चीज़ों से तो घर घर बनता है |

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