मेरे हिस्से की कहानी
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मेरे हिस्से की कहानी

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मेरे हिस्से की कहानी कौन सुनेगा?
मेरे जज़्बात, मेरे आंसू कौन देखेगा?
वो कहता है कि मैं उसे नहीं समझती
उसके हालात उसकी तकलीफें नहीं जानती
वो कहता है मैं मतलबी हूँ

मैं खुद किन तकलीफों से रोज़ गुज़रती हूँ
वो बातें उसको कौन कहेगा?
मेरे हिस्से का दुःख, मेरे हिस्से के ताने
जो सब कुछ मुझे झेलना पड़ता है
उन चीज़ों का वज़न कौन तौलेगा?

अपने दुःख वो मुझे नहीं बताता
मेरी ख़ातिर न जाने क्या-क्या झेलता है
जानती हूँ समझती हूँ
इसलिए तो अपने रोने भी उसके पास नहीं रोती

अपने मन कि हज़ार बातें जो पहले बिना सोचे
बिना समझे उसको कह डालती थी
अब ख़ुद तक सीमित रखती हूँ
बहुत सी ऐसी बातें हैं जो खलती हैं
बहुत से ऐसे वाक्ये हैं जो ठीक नहीं लगते

खून के घूँट पीती हूँ
पर उसको नहीं कहती
लेकिन कभी- कभी मेरे सब्र की डोर भी टूट जाती है
चाहे अनचाहे
मेरी जुबां भी खुल जाती है
टपक जाते हैं दो-चार लफ्ज़ ज़हरीले से
लेकिन वो इस बात को क्यों नहीं समझता

कि इंसान हूँ मैं
ऐसा नहीं कि उसकी क़द्र नहीं है
ऐसा नहीं कि उसकी स्थिति नहीं समझती
लेकिन ये बताओ ना
मेरे हिस्से की कहानी कौन सुनेगा?
मेरे जज़्बात, मेरे आंसू कौन देखेगा?

About Post Author

Surabhi Pandey

A journalist by training, Surabhi is a writer and content consultant currently based in Singapore. She has over seven years of experience in journalistic and business writing, qualitative research, proofreading, copyediting and SEO. Working in different capacities as a freelancer, she produces both print and digital content and leads campaigns for a wide range of brands and organisations – covering topics ranging from technology to education and travel to lifestyle with a keen focus on the APAC region.
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