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च्यास…

पता ही नहीं चला कि कब तुम मेरी ज़िन्दगी में इतनी महत्वपूर्ण हो गयी… न जाने कौन से साल का वो कौन सा महीना था, जब मुझे तुम्हारे बिना सवेरे उठना अच्छा नहीं लगने लगा… न जाने वो कौन सी पहर थी जिसमे तुम्हारे बिना, बातें अधूरी लगने लगी….

अकेली रहूं या किसी के साथ, तुम्हारे बिना कुछ अच्छा नहीं लगता !

सुबह की पहली अंगड़ाई हो या दिन भर की भागदौड़ के बाद घर घुसना…. मेरा दिन तुम्हारे बिना अधूरा है.. और शामें तो जैसे तुम्हारा दीदार लिए बिना ढलने को तैयार ही नहीं होतीं…

पहले तुम कलम और कागज़ पर साथ देती थी… अब कीबोर्ड पर हौसला बढाती हो.. एक दोस्त, एक संगिनी, एक हमसफ़र बन गयी हो तुम… ताज़गी का एहसास दिलाती हो, थकान दूर भगाती हो…. तुम्हारे बिना अगर चार-छे घंटे गुज़ार दूँ तो एक बेचैनी सी होने लगती है, सर में दर्द सा होने लगता है…!

तुम्हारी तलब भी अजीब है… जिस पल हो तुम्हे पाने की चाहत जाग उठे उस पल दिमाग एकदम बेरोज़गार हो जाता है… तुम ही चाहिए होती हो बस… और जैसे ही तुम मिल जाती हो, तुम्हे होठों से लगाते ही जिस सुकून का एहसास होता है, उसकी तुलना दुनिया में किसी एहसास से नहीं की जा सकती!

सच है ये.. चाय – तुम्हारी प्यास ही कुछ ख़ास है… च्यास है !

 

 

 

 

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Comments

Mamta Pandey
May 16, 2018 at 3:58 pm

Correct.
Enjoyed ur chyaas.



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